भगवान स्वामीनारायण (सहजानंद स्वामी) और आरोग्यकी बाते
भगवान स्वामीनारायण (सहजानंद स्वामी) का जीवन न केवल आध्यात्मिक शांति के लिए, बल्कि समाज के शारीरिक कल्याण और स्वास्थ्य के प्रति उनकी जागरूकता के लिए भी जाना जाता है। उन्होंने 'आरोग्य' को भक्ति का एक माध्यम माना, क्योंकि एक स्वस्थ शरीर ही सेवा और सिमरन कर सकता है।
यहाँ भगवान स्वामीनारायण के जीवन से जुड़े आरोग्य और रोग मुक्ति के कुछ प्रमुख प्रसंग और सिद्धांत दिए गए हैं:
1. 'शिक्षापत्री' में स्वास्थ्य के नियम
भगवान स्वामीनारायण ने अपने द्वारा लिखी गई 'शिक्षापत्री' में केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि Hygiene (स्वच्छता) और आरोग्य के कड़े नियम दिए हैं:
• नित्य स्नान: उन्होंने हर भक्त के लिए सूर्योदय से पूर्व स्नान अनिवार्य किया।
• शुद्ध जल: पानी और दूध को हमेशा कपड़े से छानकर पीने का निर्देश दिया (ताकि सूक्ष्म जीव और अशुद्धियाँ शरीर में न जाएं)।
• व्यसन मुक्ति: उन्होंने शराब, भांग, तंबाकू और मांसाहार का पूर्ण त्याग करवाया, जो आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी गंभीर बीमारियों की जड़ हैं।
2. महामारी के दौरान सेवा (प्लेग और हैजा)
जब गुजरात में प्लेग और हैजा जैसी महामारियाँ फैली थीं, तब भगवान स्वामीनारायण ने स्वयं और अपने संतों के माध्यम से बीमारों की सेवा की।
• उन्होंने जात-पात का भेद मिटाकर पीड़ितों को दवा और सांत्वना दी।
• वे मानते थे कि "रोगी की सेवा करना ही साक्षात नारायण की सेवा है।"
3. आध्यात्मिक शक्ति से रोग मुक्ति के प्रसंग
सत्संग साहित्य में ऐसे कई प्रसंग हैं जहाँ भक्तों ने भगवान की कृपा से असाध्य रोगों से मुक्ति पाई:
• मयाराम भट्ट का प्रसंग: मयाराम भट्ट जब बीमार हुए, तब महाराज ने उन्हें अपनी दिव्य दृष्टि और सांत्वना से स्वस्थ किया।
• कुष्ठ रोगियों पर कृपा: उस समय कुष्ठ रोग (Leprosy) को सामाजिक अभिशाप माना जाता था। महाराज ने कई कुष्ठ रोगियों को न केवल अपनाया बल्कि उन्हें स्पर्श कर अपनी कृपा से निरोगी बनाया।
4. प्राकृतिक चिकित्सा और संयम
भगवान स्वामीनारायण अक्सर अपने शिष्यों को मिताहार (जरूरत से कम और शुद्ध भोजन) की सलाह देते थे। उन्होंने सिखाया कि:
• रोगों का मुख्य कारण जीभ का स्वाद और असंयम है।
• उन्होंने उपवास (एकादशी) के महत्व को समझाया, जो शरीर के 'Detoxification' (शुद्धिकरण) की एक प्राचीन पद्धति है।
आरोग्य का मूल मंत्र
भगवान स्वामीनारायण का मानना था कि:
"शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्"
अर्थात: धर्म का पालन करने के लिए शरीर का स्वस्थ होना पहला साधन है।
भगवान स्वामीनारायण के चरित्रों में रोग मुक्ति की कई अद्भुत कथाएँ हैं। यहाँ दो विशेष प्रसंग दिए गए हैं जो यह दर्शाते हैं कि कैसे उन्होंने अपने भक्तों की शारीरिक और मानसिक व्याधियों को दूर किया:
1. दादा खाचर और असाध्य रोग की मुक्ति
गढडा के दरबार दादा खाचर भगवान स्वामीनारायण के अनन्य भक्त थे। एक बार दादा खाचर के शरीर में एक ऐसा रोग हुआ जिससे उनके शरीर से अत्यंत दुर्गंध आने लगी और घाव हो गए। उस समय के वैद्यों ने इसे लाइलाज मान लिया था।
• प्रसंग: महाराज (भगवान स्वामीनारायण) स्वयं दादा खाचर के पास गए। उन्होंने देखा कि लोग दुर्गंध के कारण दूर भाग रहे थे, लेकिन महाराज ने स्वयं अपने हाथों से उनके घावों को साफ किया और उन पर मरहम लगाया।
• सीख: महाराज ने न केवल उन्हें शारीरिक रूप से स्वस्थ किया, बल्कि समाज को यह संदेश भी दिया कि बीमार व्यक्ति घृणा का नहीं, बल्कि करुणा और सेवा का पात्र है। उनकी दिव्य दृष्टि मात्र से दादा खाचर का शरीर कंचन जैसा शुद्ध हो गया।
2. जुआभाई का 'मृगी' (Epilepsy) का रोग
एक भक्त थे जिनका नाम जुआभाई था। उन्हें बचपन से ही मिरगी (Fits) के दौरे पड़ते थे। वे बहुत परेशान थे क्योंकि आध्यात्मिक साधना में उनका मन नहीं लग पाता था।
• प्रसंग: एक बार वे महाराज के दर्शन के लिए आए और अपनी व्यथा सुनाई। महाराज ने उनसे कहा, "आप घबराएं नहीं, अब से यह रोग आपको परेशान नहीं करेगा।" * परिणाम: महाराज ने उन्हें अपनी विशेष कृपा और कुछ मानसिक संयम के नियम दिए। कहा जाता है कि महाराज के उस संकल्प के बाद जुआभाई को जीवन भर कभी दोबारा दौरा नहीं पड़ा। वे पूरी तरह स्वस्थ होकर भक्ति में लीन हो गए।
3. महामारी में संतों की 'वैद्य' के रूप में सेवा
एक बार अहमदाबाद और आसपास के क्षेत्रों में भयंकर हैजा (Cholera) फैला था। लोग गांव छोड़कर भाग रहे थे।
• सेवा कार्य: भगवान स्वामीनारायण ने अपने 500 परमहंसों (संतों) को आदेश दिया कि वे झोपड़ियों में जाएं और बीमारों की सेवा करें।
• चमत्कार: महाराज स्वयं बीमारों के पास जाकर उनके सिर पर हाथ रखते थे। लोक कथाओं के अनुसार, महाराज के स्पर्श मात्र से लोगों का बुखार और संक्रमण उतर जाता था। उन्होंने भक्तों को 'तुलसी' और 'नीम' जैसी प्राकृतिक औषधियों के उपयोग का भी मार्गदर्शन दिया।
स्वास्थ्य के लिए महाराज का दृष्टिकोण
भगवान स्वामीनारायण अक्सर कहते थे कि:
1. शुद्ध आहार: जो अन्न हम खाते हैं, वैसा ही हमारा मन बनता है।
2. मानसिक शांति: चिंता और क्रोध ही रोगों के मूल कारण हैं।
‘शिक्षापत्री' में बताए गए स्वास्थ्य नियमों
भगवान स्वामीनारायण ने 'शिक्षापत्री' में स्वास्थ्य और स्वच्छता के जो नियम लिखे हैं, वे आज के 'Modern Hygiene' के सिद्धांतों से काफी मिलते-जुलते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया था कि भक्ति तभी संभव है जब शरीर निरोगी हो।
यहाँ मुख्य स्वास्थ्य नियम (Health Rules) दिए गए हैं:
1. जल और आहार की शुद्धि (Water & Food Hygiene)
• छना हुआ जल: श्लोक 30 में उन्होंने निर्देश दिया कि पानी और दूध को हमेशा बारीक कपड़े से छानकर ही पीना चाहिए। यह सूक्ष्म जीवों (Bacteria/Parasites) से बचने का उस समय का सबसे प्रभावी तरीका था।
• शुद्ध आहार: उन्होंने तामसिक भोजन, मांस और नशीले पदार्थों (शराब, तंबाकू, भांग) का पूर्ण निषेध किया, जो कैंसर और हृदय रोगों का मुख्य कारण हैं।
2. व्यक्तिगत स्वच्छता (Personal Hygiene)
• नित्य स्नान: सूर्योदय से पहले स्नान करना अनिवार्य बताया। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ती है और ताजगी बनी रहती है।
• शौच के नियम: उन्होंने खुले में शौच का निषेध किया और निर्देश दिया कि शौच के बाद हाथों और पैरों को मिट्टी (साबुन के स्थान पर उस समय) और जल से अच्छी तरह साफ करना चाहिए।
• दातून (Oral Health): दांतों की सफाई के लिए उन्होंने उचित दातून के उपयोग पर जोर दिया, ताकि मुख के रोग न हों।
3. पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public Health)
• थूकना वर्जित: उन्होंने मंदिर, नदी के किनारे, या सार्वजनिक रास्तों पर थूकने की सख्त मनाही की। यह संक्रमण (Infections) को फैलने से रोकने का एक बड़ा कदम था।
• नदी की पवित्रता: नदियों और जलाशयों में गंदगी करने या कपड़े धोने की मनाही की, ताकि जल प्रदूषित न हो।
4. चिकित्सा और औषधि (Medical Ethics)
• वैद्य की सलाह: बीमार होने पर उन्होंने खुद से इलाज करने के बजाय किसी अनुभवी और सदाचारी वैद्य (Doctor) से सलाह लेने और औषधि लेने का निर्देश दिया।
• उपवास (Detoxification): एकादशी के उपवास का नियम दिया, जो पाचन तंत्र को आराम देने और शरीर को अंदर से साफ करने का वैज्ञानिक तरीका है।
5. मानसिक स्वास्थ्य (Mental Well-being)
महाराज जानते थे कि 'चिंता' ही 'चिता' है। इसलिए उन्होंने सिखाया:
• क्षमा और धैर्य: क्रोध और ईर्ष्या का त्याग करने से मानसिक तनाव (Stress) कम होता है।
• सत्संग: सकारात्मक लोगों के साथ रहने और भगवान के सिमरन से मन शांत रहता है, जिससे 'Psychosomatic' (मानसिक कारणों से होने वाली) बीमारियाँ नहीं होतीं।

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