अखंड भारत संकल्प दिन-
અખંડ ભારત સ્મૃતિ દિવસ પર પ્રસ્તુત લેખનો શુદ્ધ વ્યાકરણ અનુસાર હિન્દી અનુવાદ:
इस विषय 'अखंड भारत स्मृति दिवस' पर विचार करने से पहले, आइए हम भारत विभाजन की गाथा का स्मरण करें। भारत का विभाजन संभव हुआ, परंतु उससे पहले 'बंग-भंग' (बंगाल विभाजन) को स्वीकार नहीं किया गया था और उसके विरुद्ध चले आंदोलन में सफलता प्राप्त हुई थी। आइए देखें कि दोनों घटनाओं में क्या हुआ था।
बंग-भंग आंदोलन को कई वर्ष बीत चुके हैं, परंतु उसका महत्व इसलिए है क्योंकि उसने स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल दी थी। भारत का इतिहास बदल गया, राष्ट्रीयता में वृद्धि हुई, 'वंदे मातरम्' स्वतंत्रता का नारा बना और स्वदेशी आंदोलन प्रारंभ हुआ। हम बंगाल का विभाजन तो रोक सके, परंतु 1947 में भारत का विभाजन नहीं रोक पाए।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में बहादुर शाह ज़फ़र, तात्या टोपे, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई आदि देशभक्तों के कारण देश का वातावरण पूरी तरह बदल गया। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद आए परिवर्तन: ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत का शासन अपने हाथों में ले लिया। स्थानीय नौकरियों में देश के लोगों को स्थान मिलने लगा। कई लोग अंग्रेज़ी में शिक्षा प्राप्त करने लगे। हिंदू और मुस्लिम एक-दूसरे के निकट आने लगे। बंगाल के लोगों को इसका अधिक लाभ मिला क्योंकि कोलकाता अंग्रेज़ों का मुख्य केंद्र (शहर) था।
बंगाल में राष्ट्रीयता की भावना अधिक प्रबल थी। महाराष्ट्र में भी थी, परंतु बंगाल सबसे आगे था। वहाँ के युवा अधिक सक्रिय थे। बंगाल के युवाओं को तीव्र बुद्धि वाला और शक्तिशाली माना जाता था। बंगाल अंग्रेज़ों की सत्ता के लिए सिरदर्द बन चुका था।
1905 में भारत आए तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने कुछ निर्णय लिए। उसने शिक्षा के नियमों में परिवर्तन करके हिंदुओं की भागीदारी घटाई तथा शिक्षा समिति में सैयद हुसैन को शामिल किया। उसने विश्वविद्यालय और नगरपालिका से संबंधित कानूनों में भी बदलाव किए। साथ ही उसने 'ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट' को भी संशोधित किया। 1857 के संग्राम में अंग्रेज़ों की सहायता करने वालों को उच्च पदों पर अधिक महत्व दिया गया।
प्रशासनिक अव्यवस्था का झूठा बहाना बनाकर लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन कर दिया। परिणामस्वरूप असम मुस्लिम-बहुल क्षेत्र बन गया और पूर्वी बंगाल भी मुस्लिम-बहुल बन गया (ढाका, मुर्शिदाबाद, चटगाँव ज़िले बने)। पश्चिमी बंगाल में बिहार और ओडिशा के लोगों के कारण बंगाली स्वयं अल्पसंख्यक हो गए।
अंग्रेज़ों की दृष्टि में बंगाल विभाजन के कारण:
बंगाल एक बहुत बड़ा प्रांत था — जिसमें 48 ज़िले, 7 करोड़ 80 लाख की जनसंख्या, 1,89,000 वर्ग मील का क्षेत्रफल और 12 करोड़ की राजस्व आय थी। इसमें बंगाल, असम, बिहार और ओडिशा के कई ज़िले सम्मिलित थे। यह बंबई (मुंबई) से भी बड़ा था। यह तर्क दिया गया कि प्रशासनिक व्यवस्था को सुगम बनाने के लिए विभाजन आवश्यक है, परंतु इसके पीछे वास्तविक नीति हिंदू-मुस्लिमों को विभाजित करने की थी।
लॉर्ड कर्ज़न ने राजाओं और धनी वर्ग की सहायता करना प्रारंभ किया। उसने निर्धन मुसलमानों को भी सहायता देना शुरू किया। अंग्रेज़ों ने सर सैयद अहमद के माध्यम से मुस्लिम बैंक प्रारंभ करवाया। उन्हीं के माध्यम से 1877 में मुसलमानों के लिए 'एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज' की स्थापना हुई, जो आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना। 'द लॉयल मोहम्मडन्स ऑफ इंडिया' (हिंद के वफ़ादार मुस्लिम) नाम से एक पत्रिका प्रारंभ की गई, जिसकी 'द लंदन टाइम्स' द्वारा सराहना की गई।
परंतु लोगों ने बंगाल विभाजन का विरोध क्यों किया?
क्योंकि यह बंगाल की एकता को नष्ट करने का एक षड्यंत्र था। असम मुस्लिम-बहुल बनने जा रहा था और सामाजिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से लोग एक-दूसरे से अलग नहीं होना चाहते थे। अंग्रेज़ों ने अपने वास्तविक उद्देश्य को छिपाकर बंगाल का विभाजन किया:
5 जून 1905: हाउस ऑफ कॉमन्स में ब्रिटिश सरकार ने कहा कि हम इस पर विचार कर रहे हैं।
जुलाई 1905: ब्रॉडरिक ने कहा कि जनता इसकी मांग कर रही है।
7 जुलाई 1905: शिमला से वायसराय द्वारा बंग-भंग की घोषणा की गई।
19 जुलाई 1905: कोलकाता से इसकी औपचारिक घोषणा हुई।
16 अक्टूबर 1905: विभाजन को प्रभावी रूप से लागू कर दिया गया।
बंगाल विभाजन के विरुद्ध प्रचंड आंदोलन छिड़ गया। इस आंदोलन का आह्वान 7 जुलाई को हुआ। सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने 'द बंगाली' और 'संजीवनी' पत्रिकाओं में इसके विषय में विस्तार से लिखा। उसी समय कोलकाता में विशाल जनसभाएँ आयोजित हुईं। खुलना, पाबना, दिनाजपुर के कॉलेजों और विद्यालयों में बैठकें आयोजित की गईं। लोगों ने 1 वर्ष तक राष्ट्रीय शोक मनाने का निर्णय लिया तथा मनोरंजन के सभी कार्यक्रम बंद कर दिए गए। समाचार पत्रों में काली सीमाओं (ब्लैक बॉर्डर) के साथ शोक-संदेश छपने लगे।
बंगाल के इस मुद्दे ने पूरे देश को जाग्रत कर दिया। इसी कालखंड में स्वामी विवेकानंद की भारत यात्रा से राष्ट्रीयता का नवजागरण हो चुका था, साथ ही भगिनी निवेदिता ने बंगाल को अपनी कर्मभूमि बनाया। बिपिन चंद्र पाल ने 'न्यू इंडिया' पत्रिका प्रारंभ की। बंगाल में 'शिवाजी जयंती' मनाने की शुरुआत हुई। रवींद्रनाथ टैगोर ने शिवाजी और स्वदेशी पर प्रेरक निबंध लिखे। ब्रह्मबांधव उपाध्याय ने 'संध्या' में लिखा। श्री अरविंद घोष ने बंकिमचंद्र, तिलक और दयानंद सरस्वती पर निबंध लिखे।
बंगाल में विभिन्न स्थानों पर आंदोलन:
कोलकाता में विशाल रैलियाँ निकाली गईं, लोगों ने गंगा में स्नान किया और एक-दूसरे की कलाई पर रक्षासूत्र (राखी) बांधकर एकता प्रदर्शित की। 1905 के कांग्रेस अधिवेशन में गोपाल कृष्ण गोखले ने कहा कि "कर्ज़न औरंगज़ेब का दूसरा अवतार है।" आनंद मोहन बोस ने बंगाल की एकता की सुदृढ़ नींव रखी।
इसी दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थिति:
कांग्रेस की स्थापना 1885 में ए. ओ. ह्यूम (A.O. Hume) द्वारा की गई थी। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन की मंशा के अनुसार कांग्रेस जनता के आक्रोश को नियंत्रित करने वाला एक 'सेफ्टी वाल्व' (Safety Valve) थी। कांग्रेस का तीसरा राष्ट्रीय अधिवेशन मद्रास में हुआ, जहाँ गवर्नर के साथ ए. ओ. ह्यूम ने वक्तव्य दिया। कांग्रेस के प्रारंभिक दौर में 1890 में कोलकाता अधिवेशन हुआ, जिसके अध्यक्ष फ़िरोज़शाह मेहता थे। 1895 में सुरेंद्रनाथ बनर्जी अध्यक्ष बने और उन्होंने ब्रिटिश राज के प्रति निष्ठा की प्रतिज्ञा ली।
लॉर्ड कर्ज़न ने पूरे बंगाल का दौरा करके मुसलमानों को प्रलोभन दिया। उसने ढाका के नवाब सलीमुल्लाह खान को मात्र नाममात्र के ब्याज पर ₹1,00,000 का ऋण दिया। वही नवाब, जिन्होंने पहले बंगाल विभाजन को "शैतानी कृत्य" कहा था, बाद में इसके प्रबल समर्थक बन गए। मुसलमानों को कांग्रेस से दूर करने का प्रयास तीव्र हो गया। इस संपूर्ण षड्यंत्र का उल्लेख स्वामी श्रद्धानंद ने अपनी पुस्तक 'इनसाइड कांग्रेस' (Inside Congress) में किया है। यद्यपि ढाका के नवाब ख्वाजा सलीमुल्लाह खान के भाई नवाब ख्वाजा अतीकुल्लाह खान और अब्दुल रशीद विभाजन-विरोधी आंदोलन के साथ खड़े रहे।
1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना:
इसका मुख्य उद्देश्य मुसलमानों में अलगाववाद को बढ़ावा देना था। इसके प्रमुख नेता सलीमुल्लाह खान बने और अध्यक्ष आगा खान बने। 'लाल इश्तेहार' नामक हिंदुओं के विरुद्ध विषवमन करने वाला एक पैम्फलेट जारी किया गया। प्रारंभ में मुस्लिम लीग में केवल ज़मींदार, नवाब और सरकारी अधिकारी ही सम्मिलित थे।
इसी कालखंड में 'लाल-बाल-पाल' (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल) की त्रिमूर्ति सक्रिय हुई। लोकमान्य तिलक ने चार सूत्र दिए: स्वराज्य, स्वदेशी, राष्ट्रीय शिक्षा और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार। 'वंदे मातरम्' और "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है" के नारों ने गूँज पैदा की। कांग्रेस ने ब्रिटिश सत्ता की कृपा पर निर्भर रहना बंद किया और उनके आगे याचना करने की नीति त्याग दी।
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार:
संपूर्ण बंगाल से फैली यह अलख पूरे देश में पहुँची। पुणे में विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। फर्ग्यूसन कॉलेज में अध्ययनरत वीर सावरकर ने इसका नेतृत्व किया, जिसके कारण उन्हें कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया। इस घटना पर तिलक जी ने अपने समाचार पत्र 'केसरी' में कॉलेज के हिंदू प्रिंसिपल की आलोचना करते हुए लिखा: “प्रासादशिखरस्थोऽपि काको न गरुडायते” (राजमहल के शिखर पर बैठने मात्र से कौआ कभी गरुड़ नहीं बन जाता)।
'वंदे मातरम्' स्वतंत्रता आंदोलन का महामंत्र बन गया। कैम्ब्रिज डिक्शनरी के अनुसार यह भारत का अघोषित राष्ट्रगान (Un-official National Anthem) बन गया था। बंग-भंग विरोधी आंदोलन एक व्यापक स्वदेशी आंदोलन में बदल गया। चारों ओर 'वंदे मातरम्' गूँजने लगा। अंग्रेज़ी समाचार पत्र इसे एक 'गुप्त कोड' (Secret Code) मानने लगे। नागपुर में छात्र केशव (डॉ. हेडगेवार) ने भी नील सिटी स्कूल में 'वंदे मातरम्' के जयघोष से अंग्रेज़ अधिकारी का स्वागत किया और विद्यालय से निष्कासित होना स्वीकार किया।
देश की बदलती हुई क्रांतिकारी परिस्थितियाँ:
1909 में मदनलाल धींगरा ने कर्ज़न वायली का वध किया। अत्याचारी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड पर बम फेंका गया। अहमदाबाद में लॉर्ड मिंटो की बग्गी पर बम फेंका गया। अंग्रेज़ भयभीत हो गए। 11 अगस्त 1908 को खुदीराम बोस को फाँसी दी गई। कन्हाईलाल दत्त, सत्येंद्रनाथ बोस, उल्लासकर दत्त, हेमचंद्र दास और वारींद्रनाथ घोष को भी कठोर दंड दिए गए।
अंग्रेज़ी हुकूमत का दमनचक्र तीव्र हो गया। लोकमान्य तिलक को मांडले जेल भेज दिया गया, लाला लाजपत राय को देश निकाला दिया गया, जेल से छूटने के पश्चात श्री अरविंद पांडिचेरी चले गए, बिपिन चंद्र पाल को जेल भेजा गया। वहीं दूसरी ओर अंग्रेज़ों ने फ़िरोज़शाह मेहता को 'नाइटहुड' की उपाधि देकर शांत करने का प्रयास किया और पटना के इमाम को जज बना दिया।
1911 - जॉर्ज पंचम का आगमन और बंग-भंग का निरसन:
1911 में जॉर्ज पंचम के भारत आगमन पर भारी जन-विरोध के आगे झुकते हुए बंगाल का विभाजन रद्द कर दिया गया। असम में कमिश्नर की नियुक्ति की गई तथा बिहार और ओडिशा को बंगाल से अलग प्रांत बनाया गया। बंगाल पुनः एक हो गया। इसी समय देश की राजधानी को कोलकाता से हटाकर दिल्ली स्थानांतरित किया गया।
अखंड भारत के भू-भाग का निरंतर विखंडन:
1947 के पूर्व भी अखंड भारत से बर्मा (म्यांमार), श्रीलंका, तिब्बत और अफगानिस्तान जैसे भू-भाग अलग हो चुके थे।
1 अप्रैल 1937: बर्मा (म्यांमार) को भारत से अलग कर दिया गया।
14 अगस्त 1947: पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान का निर्माण हुआ।
1948: पाकिस्तान के आक्रमण के फलस्वरूप कश्मीर का एक-तिहाई भू-भाग उसके अवैध नियंत्रण में चला गया (PoK - पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर)।
1954: पाकिस्तान ने कच्छ के रण क्षेत्र में घुसपैठ करके भूमि पर अधिकार का प्रयास किया।
1962: चीन ने कश्मीर के पूर्वी क्षेत्र (पामीर से लद्दाख/अक्साई चिन क्षेत्र - लगभग 16,000 वर्ग मील) पर अनाधिकृत कब्ज़ा कर लिया।
पाकिस्तान ने काराकोरम का 5,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन को उपहार स्वरूप सौंप दिया। चीन आज भी अरुणाचल प्रदेश पर अपना अनुचित दावा प्रस्तुत करता है।
1975: बांग्लादेश के हल्दिया बंदरगाह के निकट 'न्यू मूर' द्वीप को लेकर विवाद हुआ।
1974: श्रीलंका के साथ मन्नार की खाड़ी में स्थित 'कच्चातीवु' (Katchatheevu) द्वीप को लेकर समझौता हुआ।
नरसिम्हा राव के कार्यकाल में 'तीन बीघा' गलियारा बांग्लादेश को पट्टे पर सौंपा गया।
भारत विभाजन के प्रमुख कारण:
(1) मुस्लिम लीग की स्थापना और अलगाववाद का उदय:
1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई, जिसे लॉर्ड मिंटो ने संरक्षण दिया और 'लाल इश्तेहार' जैसे पर्चे बाँटे गए। 1911 में बंगाल विभाजन रद्द होने की ऐतिहासिक विजय का राजनीतिक लाभ कांग्रेस नहीं उठा सकी। 1916 का लखनऊ समझौता (Lucknow Pact): कांग्रेस और मुस्लिम लीग का संयुक्त अधिवेशन हुआ, जहाँ तिलक जी ने भी कहा "Luck Now" (भाग्य अब साथ है)।
(2) तुष्टीकरण की शुरुआत:
महात्मा गांधी और कांग्रेस द्वारा 'खिलाफत आंदोलन' को बिना शर्त समर्थन दिया गया। कमाल पाशा द्वारा तुर्की में खिलाफत समाप्त किए जाने से यह आंदोलन विफल हो गया। बाद में केरल में बर्बर 'मोपला नरसंहार' हुआ। यह एक कटु सत्य है कि जिसकी निष्ठा देश की सीमा से बाहर हो, वह विचार कभी राष्ट्रहितैषी नहीं हो सकता। गांधीजी की नीति थी: "हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना स्वराज्य संभव नहीं"। इसके परिणामस्वरूप हिंदू समाज को निरंतर त्याग करना पड़ा और एकतरफ़ा तुष्टीकरण बढ़ा। धर्मपरिवर्तित हिंदुओं की घर-वापसी के लिए स्वामी श्रद्धानंद जी ने 'शुद्धि आंदोलन' चलाया, परंतु अब्दुल रशीद नामक व्यक्ति ने उनकी हत्या कर दी और तत्कालीन नेतृत्व द्वारा इसकी स्पष्ट निंदा भी नहीं की गई।
(3) मोहम्मद अली जिन्ना: राष्ट्रवादी से अलगाववादी तक:
जिन्ना प्रारंभ में लोकमान्य तिलक के समर्थक थे। वे पृथक निर्वाचक मंडल और खिलाफत आंदोलन के विरोधी तथा राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने वाले नेता थे। परंतु कांग्रेस द्वारा उन्हें उपेक्षित कर आगा खान और अली बंधुओं को अधिक महत्व दिया गया। इसके परिणामस्वरूप, कभी नमाज़ न पढ़ने वाले जिन्ना कट्टरता के मार्ग पर चले गए और उग्र अलगाववादी बन गए।
(4) राष्ट्रीय प्रतीकों और सिद्धांतों से समझौते:
'वंदे मातरम्' का संक्षिप्तीकरण: बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा रचित 'आनंदमठ' उपन्यास के इस अमर गीत का 1923 के काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन में जब पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर गायन कर रहे थे, तब कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली ने इसका विरोध किया और मंच से नीचे उतर गए, परंतु किसी ने उन्हें नहीं रोका। अंततः 1937 में पूरे गीत को काटकर केवल दो छंदों (कड़ियों) तक सीमित कर दिया गया।
राष्ट्रध्वज का स्वरूप: 1921 में आंध्र प्रदेश के एक युवक (पिंगली वेंकैया) ने गांधीजी को लाल और हरे रंग की पट्टियों के बीच चरखे वाला ध्वज भेंट किया। 1931 में गठित ध्वज समिति (जिसमें सरदार पटेल, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आज़ाद, काका कालेलकर, डॉ. हार्डीकर और पट्टाभि सीतारमैया थे) ने 'केसरिया ध्वज और बीच में चरखा' का प्रस्ताव दिया था। परंतु गांधीजी के सुझाव पर तीन पट्टियों (केसरिया, सफेद, हरा और बीच में चरखा) वाला ध्वज स्वीकृत हुआ, जो बाद में अशोक चक्र के साथ हमारा राष्ट्रध्वज बना।
राष्ट्रभाषा का विवाद: संस्कृत से जन्मी और देश में सर्वाधिक बोली जाने वाली हिंदी के स्थान पर सबको संतुष्ट करने के नाम पर उर्दू को प्राथमिकता देने का प्रयास हुआ। उर्दू, जो मूलतः एक बोली के रूप में विकसित हुई थी, के स्थान पर अंततः हिंदी और उर्दू की मिली-जुली शैली 'हिंदुस्तानी' भाषा को थोपने का प्रयास किया गया।
तुष्टीकरण के कारण गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया गया। मस्जिदों के सामने से संगीत व बाजे बजाने पर प्रतिबंध और नियंत्रण लगाए गए। महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज और गुरु गोविंद सिंह जैसे राष्ट्रनायकों को 'भटके हुए देशभक्त' (Misguided Patriots) तक कह दिया गया।
मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना की हठधर्मिता के आगे अंततः कांग्रेस ने विभाजन स्वीकार कर लिया। जिन्ना स्वयं को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि मानते थे, सत्ता में समान भागीदारी चाहते थे और 'द्वि-राष्ट्र सिद्धांत' (Two-Nation Theory) के प्रति आग्रही थे। उनका तर्क था: "मुसलमान कोई अल्पसंख्यक वर्ग नहीं बल्कि एक अलग राष्ट्र हैं। भारत में 'मुस्लिम इंडिया' और 'हिंदू इंडिया' दो अलग अस्तित्व हैं। हिंदू मुसलमानों पर शासन नहीं कर सकते; मुसलमान शासक रहे हैं और हिंदू प्रजा।" दुर्भाग्यवश उनकी यह विभाजनकारी सोच सफल हो गई। कांग्रेस पूर्व में द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को नकारती थी और कहती थी कि जिन्ना अकेले मुसलमानों के प्रतिनिधि नहीं हैं, सत्ता में समानांतर विभाजन नहीं हो सकता और धर्म के आधार पर देश का बँटवारा नहीं हो सकता।
गांधीजी ने कहा था: "देश का विभाजन मेरी लाश पर होगा" और नेहरूजी कहते थे: "जो लोग पाकिस्तान की बात सोचते हैं, वे मूर्खों के स्वर्ग में जी रहे हैं।" परंतु अंततः दोनों ने अपने कदमों को पीछे खींच लिया।
भारत विभाजन के 10 मुख्य कारण:
1. राष्ट्रीयता के विषय में विकृत और भ्रामक धारणा।
2. मुस्लिम वर्ग का निरंतर तुष्टीकरण।
3. सच्चे राष्ट्रवादियों की उपेक्षा।
4. राष्ट्रीय हितों और प्रतीकों पर निरंतर समझौते।
5. अंग्रेज़ों की 'फूट डालो और राज करो' (Divide and Rule) की कूटनीति।
6. जिन्ना का व्यक्तिगत अहंकार और हठ।
7. कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की राष्ट्रविरोधी नीतियाँ।
8. तत्कालीन नेतृत्व का मानसिक रूप से थक जाना और हार मान लेना।
9. हिंदू समाज की संगठित शक्ति का अभाव।
10. राष्ट्र की भ्रामक संकल्पना — "वी आर अ नेशन इन द मेकिंग" (हम बनते हुए राष्ट्र हैं) तथा 'मिली-जुली संस्कृति' का भ्रम। अंग्रेज़ों का यह दुष्प्रचार कि 'मुस्लिम बाहर से आए और आर्य (हिंदू) भी बाहर से आए' — जिससे तुष्टीकरण ने विकृत रूप धारण कर लिया।
प्रमुख ऐतिहासिक घटनाक्रम:
लॉर्ड मिंटो की योजना: सुधारों का प्रस्ताव, पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था और मुसलमानों के लिए अलग राजनीतिक मंच का विचार।
1906: सलीमुल्लाह खान और आगा खान द्वारा मुस्लिम लीग की स्थापना।
1911: बंगाल विभाजन रद्द हुआ; मुस्लिम लीग प्रभावहीन हुई, परंतु कांग्रेस ने इस स्वर्णिम अवसर का लाभ न उठाकर तुष्टीकरण का मार्ग चुना।
प्रथम विश्व युद्ध: ब्रिटेन के विरुद्ध जर्मनी और तुर्की का युद्ध, ब्रिटेन की विजय और तुर्की के खलीफा पद की समाप्ति। कमाल पाशा का सत्ता में आना और भारत में खिलाफत आंदोलन का प्रारंभ। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय और स्वामी श्रद्धानंद ने प्रारंभ में इसे ठीक समझा, जबकि रवींद्रनाथ टैगोर, एनी बेसेंट और सी. विजयराघवाचारी ने इसका विरोध किया था। गांधीजी का मानना था कि "हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना स्वराज्य नहीं"। खिलाफत आंदोलन की विफलता के बाद धर्मांधता भड़की और केरल में भीषण मोपला दंगे हुए।
1927: कांग्रेस ने जिन्ना की 3 प्रमुख माँगें स्वीकार कीं, जिनमें सिंध को बंबई प्रेसीडेंसी से अलग करना सम्मिलित था।
1928: जिन्ना के 14 सूत्रों को स्वीकार किया गया, जिसमें मुसलमानों को केवल एक समुदाय नहीं बल्कि 'राष्ट्र' बताया गया।
1930: 'सारे जहाँ से अच्छा' लिखने वाले कवि मोहम्मद इक़बाल कट्टरपंथी बन गए और उन्होंने कहा "मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहाँ हमारा"।
1930: दांडी यात्रा के साथ कांग्रेस द्वारा प्रथम गोलमेज सम्मेलन का बहिष्कार।
1931: द्वितीय गोलमेज सम्मेलन, जहाँ अंग्रेज़ों ने गांधीजी और मुस्लिम लीग के आगा खान को समान दर्जा दिया।
1933/1931: चौधरी रहमत अली ने 'पाकिस्तान' शब्द गढ़ा (पंजाब, अफगान प्रांत, कश्मीर, सिंध और बलूचिस्तान के अक्षरों से निर्मित)।
1932: 'कम्युनल अवार्ड' (सांप्रदायिक पंचाट) की घोषणा पर कांग्रेस प्रारंभ में मौन रही। इसमें दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का प्रावधान होने पर गांधीजी ने आमरण अनशन किया और 1932 में पूना पैक्ट हुआ; परंतु मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन पर कोई अनशन नहीं किया गया।
1937 के चुनाव: कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने चुनाव लड़ा। कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला और लीग अधिकांश प्रांतों में पराजित हुई। कांग्रेस ने यहाँ भी मुस्लिम लीग को राजनीतिक रूप से समाप्त करने का अवसर गँवा दिया।
जिन्ना का 'कायदे-आज़म' बनना: जो कभी कहते थे "मैं पहले राष्ट्रवादी था, हूँ और रहूँगा", वे पूरी तरह बदल गए और कहने लगे कि "पाकिस्तान का जन्म उसी दिन हो गया था जब पहले हिंदू ने इस्लाम स्वीकार किया था।"
1939: अंग्रेज़ों ने जिन्ना को अत्यधिक महत्व दिया। द्वितीय विश्व युद्ध में वायसराय लिनलिथगो ने गांधी और जिन्ना दोनों से समानांतर वार्ता की। युद्धोपरांत स्वराज्य की मांग अस्वीकार होने पर कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने सामूहिक त्यागपत्र दे दिया, जिसे मुस्लिम लीग ने 'मुक्ति दिवस' (Deliverance Day) के रूप में मनाया।
1930: लाहौर में रावी तट पर जवाहरलाल नेहरू ने पूर्ण स्वराज्य का संकल्प लिया था, परंतु 1940 में उसी लाहौर में मुस्लिम लीग ने 'पाकिस्तान प्रस्ताव' पारित किया।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI): युद्ध में अंग्रेज़ों को समर्थन दिया, मुस्लिम लीग की अलग देश की मांग का समर्थन किया और 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' का विरोध किया।
1942: कांग्रेस ने 'भारत छोड़ो' आंदोलन छेड़ा, जिसके प्रत्युत्तर में मुस्लिम लीग ने नारा दिया — "बाँटो और भागो" (Divide and Quit)।
सी. राजगोपालाचारी (राजाजी फार्मूला): जनमत संग्रह से विभाजन का विकल्प रखा, परंतु किसी ने समर्थन नहीं किया। गांधीजी और जिन्ना के मध्य 19 दिनों तक वार्ता चली। गांधीजी उन्हें 'कायदे-आज़म' कहते रहे और जिन्ना उन्हें केवल 'मिस्टर गांधी' कहते रहे।
1945: वायसराय लॉर्ड वेवेल की शिमला योजना और अंतरिम मंत्रिमंडल गठन का प्रयास विफल रहा।
1945-46 के चुनाव: कांग्रेस ने अखंड भारत और मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान निर्माण के मुद्दे पर चुनाव लड़ा। कांग्रेस को 91% गैर-मुस्लिम मतों के साथ भारी विजय मिली, जबकि मुस्लिम लीग केवल मुस्लिम आरक्षित सीटों पर जीती।
18 फरवरी 1946: रॉयल इंडियन नेवी (नौसेना) का ऐतिहासिक विद्रोह हुआ।
1946: कैबिनेट मिशन योजना आई, जिसने प्रांतों को हिंदू-बहुल और मुस्लिम-बहुल समूहों में वर्गीकृत किया, परंतु मुस्लिम लीग पूर्ण विभाजन पर अड़ी रही।
16 अगस्त 1946: मुस्लिम लीग द्वारा 'डायरेक्ट एक्शन डे' (प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस) की घोषणा; कलकत्ता और नोआखली में हिंदुओं का भीषण नरसंहार, बलात्कार और लूटपाट की गई। मुख्यमंत्री सुहरावर्दी इस हिंसा को संरक्षण दे रहे थे। बिहार में इसकी उग्र प्रतिक्रिया हुई। बाद में नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी, जिसमें आगे चलकर लीग भी गतिरोध पैदा करने के लिए शामिल हुई।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज बर्मा और अंडमान होते हुए भारत की सीमा तक पहुँच चुकी थी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंग्रेज़ आर्थिक और सैन्य रूप से पूरी तरह टूट चुके थे तथा सेना व नौसेना के विद्रोह से भयभीत थे।
20 फरवरी 1947: ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने घोषणा की कि ब्रिटेन जून 1948 तक भारत छोड़ देगा। इसके बाद लॉर्ड माउंटबेटन को वायसराय बनाकर भेजा गया।
8 मार्च 1947: कांग्रेस कार्यसमिति ने पंजाब और बंगाल के विभाजन के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया।
22 मार्च 1947: नेहरू, जिन्ना और माउंटबेटन के मध्य निर्णायक बैठकें हुईं। गांधीजी ने देश को अखंड रखने हेतु जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया, जिसे कांग्रेस ने अस्वीकार कर दिया।
3 जून 1947 (माउंटबेटन/वी.पी. मेनन योजना): भारत विभाजन और 15 अगस्त 1947 को सत्ता हस्तांतरण की तिथि निश्चित की गई।
गांधीजी का मत था कि जनमत उनके साथ है, परंतु माउंटबेटन ने कहा कि पूरी कांग्रेस उनके साथ है।
विभाजन के प्रस्ताव के विरोध में पुरुषोत्तम दास टंडन के ओजस्वी भाषण पर भारी जन-समर्थन मिला था।
अनुत्तरित ऐतिहासिक प्रश्न:
जब सत्ता हस्तांतरण की अंतिम समय-सीमा जून 1948 तय थी, तो विभाजन को अगस्त 1947 में इतनी जल्दबाज़ी में क्यों किया गया? क्या विभाजन को रोका नहीं जा सकता था?
यदि विभाजन न होता तो क्या गृहयुद्ध होता?
राष्ट्र की अखंडता की रक्षा के लिए क्या हम यह अस्थायी संकट सहन नहीं कर सकते थे? (उदाहरणार्थ, अब्राहम लिंकन ने अमेरिका की एकता के लिए भीषण गृहयुद्ध का सामना किया, परंतु हमारे नेता दृढ़ नहीं रहे)।
मुस्लिम लीग केवल अंग्रेज़ों की बैसाखियों के दम पर उछल रही थी, अंग्रेज़ों के जाते ही उसका प्रभाव स्वतः समाप्त किया जा सकता था।
गांधीजी ने विभाजन रोकने के लिए आमरण अनशन क्यों नहीं किया?
क्या अखंड भारत संभव है? — हाँ!
विश्व इतिहास गवाह है कि असंभव प्रतीत होने वाले राष्ट्र-पुनर्गठन संभव हुए हैं:
1. इज़राइल का पुनर्निर्माण (1948): 14 मई 1948 को लगभग दो हज़ार वर्षों के निर्वासन के बाद यहूदी राष्ट्र इज़राइल का पुनरोदय हुआ।
2. बर्लिन की दीवार का गिरना (1989): नवंबर 1989 में बर्लिन की दीवार ढहा दी गई और विभाजित जर्मनी का ऐतिहासिक एकीकरण हुआ।
3. सोवियत संघ (USSR) का विघटन (1991): दिसंबर 1991 में शक्तिशाली सोवियत संघ का विघटन हुआ और 15 नए स्वतंत्र देश बने।
4. बांग्लादेश का निर्माण (1971): द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की धज्जियाँ उड़ाते हुए 16 दिसंबर 1971 को स्वतंत्र बांग्लादेश का जन्म हुआ।
5. भारत का विभाजन (1947): यदि षड्यंत्रों के बल पर भारत का अप्राकृतिक विभाजन हो सकता है, तो संकल्प के बल पर यह पुनः अखंड क्यों नहीं हो सकता?
अखंड भारत कैसे संभव होगा?
यदि हमारे हृदयों में विभाजन की गहरी पीड़ा, अखंड भारत की प्रबल कामना, अटूट विश्वास, दृढ़ संकल्प और सतत पुरुषार्थ की पराकाष्ठा हो, तो कुछ भी असंभव नहीं है।
भारतीय संसद ने दो बार सर्वसम्मति से संकल्प पारित किया है:
1. 1947 में पाकिस्तान द्वारा हड़पे गए कश्मीर (PoK) को वापस लेने हेतु।
2. 1962 में चीन द्वारा कब्ज़ाए गए लद्दाख और पूर्वोत्तर भू-भाग को मुक्त कराने हेतु।
स्वतंत्रता संग्राम के सभी हुतात्माओं का एकमात्र स्वप्न 'अखंड भारत' था। किसी भी राष्ट्र के ऐतिहासिक जीवन में 50-100 वर्ष का समय बहुत बड़ा नहीं होता।
विभाजन की टीस एवं महापुरुषों का स्वप्न:
पूजनीय श्री गुरुजी (गोलवलकर): विभाजन के समय समाज की जो दारुण पीड़ा थी, वह उनके रोम-रोम में अंकित थी।
महर्षि अरविंद: "मैं अपनी आँखों के सामने अखंड भारत का साकार स्वरूप देख रहा हूँ, यह अवश्य बनेगा और भारत जगद्गुरु के पद परआसीन होगा।"
वीर सावरकर: अपने आत्मोत्सर्ग के अंतिम क्षणों में उन्होंने अपनी पुत्री से कहा था: "मुझे मेरी सिंधु नदी वापस लौटा दो।" क्या हम अपने उन पवित्र धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक तीर्थों पर पुनः अधिकार नहीं चाहते?
विभाजन के मूल कारणों का निवारण:
1. राष्ट्र और संस्कृति संबंधी भ्रांतियों का निवारण: भारत की एक ही शाश्वत संस्कृति है — वह है हिंदू संस्कृति। यह एक अनादि काल से चला आ रहा प्राचीन राष्ट्र है। यहाँ कोई 'साझी/मिश्रित' संस्कृति का कृत्रिम सिद्धांत लागू नहीं होता। आर्य कोई बाहर से नहीं आए थे; 'आर्य' एक गुणवाचक और संस्कारपरक शब्द है।
2. मुसलमानों के विषय में भ्रांतियों का अंत: यह समस्या मूलतः मुस्लिम समाज की नहीं, अपितु उनके नेतृत्व की दिशा की रही है। यह भ्रांति दूर करनी होगी कि वे इस भूमि, राष्ट्र और सनातन संस्कृति से नहीं जुड़ सकते। उन्हें उनकी जड़ों का स्मरण कराना आवश्यक है (जैसे इंडोनेशिया में मुस्लिम होते हुए भी 'गरुड़ एयरलाइंस' और 'सुकर्ण' जैसे नाम तथा रामायण की जीवंत परंपरा है; भारत में जस्टिस एम. सी. छागला, सरोद सम्राट उस्ताद अलाउद्दीन खान जैसे उदाहरण रहे हैं)। साथ ही मुस्लिम समाज में सऊदी अरब जैसे आधुनिक सामाजिक सुधारों की आवश्यकता है।
3. हिंदू समाज की मानसिकता में परिवर्तन: राष्ट्रवादी मुसलमानों की पहचान कर उन्हें संबल देना (जैसे अमर बलिदानी रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्ला खाँ की मित्रता)। 'सद्गुण विकृति' और पलायनवादी मानसिकता का त्याग करना।
4. हिंदू समाज का शक्ति-संपन्न बनना: जिस प्रकार गंगा में मिलने वाली प्रत्येक जलधारा गंगा बन जाती है, उसी प्रकार जब समाज शक्ति-संपन्न होगा तभी वह सबको आत्मसात कर सकेगा।
5. तुष्टीकरण का पूर्ण अंत: तुष्टीकरण करने वाले अल्पसंख्यक समाज के मित्र नहीं, शत्रु हैं। संकट के समय निःस्वार्थ मानवीय सहायता अवश्य करें (जैसे 1996 के चरखी दादरी विमान हादसे में अथवा मोरबी बांध आपदा के समय रोज़ेदारों के लिए की गई मानवीय व्यवस्था)।
6. 'अल्पसंख्यक' शब्द की समाप्ति: इस देश में कोई भी 'अल्पसंख्यक' नहीं है; वोट बैंक आधारित अलगाववादी राजनीति को पूर्णतः बंद करना होगा।
7. मित्र और शत्रु की स्पष्ट पहचान: हमारे राष्ट्रीय महापुरुष कौन हैं, इसकी स्पष्टता होनी चाहिए — छत्रपति शिवाजी महाराज, राजा मानसिंह, राजा जयसिंह, कृष्णभक्त रसखान, बलिदानी अशफ़ाक़ उल्ला खाँ हमारे आदर्श हैं; न कि आक्रांता बाबर, अकबर, औरंगज़ेब अथवा लॉर्ड मिंटो।
8. मुस्लिम समाज में आधुनिक शिक्षा का विस्तार: मदरसों के पारंपरिक पाठ्यक्रम में सुधार हो, आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा मुख्यधारा से जुड़े। हामिद दलवई तथा 'रीडिस्कवरी ऑफ पाकिस्तान' के लेखक अनवर हुसैन खान जैसे प्रगतिशील विचारकों को आगे लाना होगा।
9. पड़ोसी क्षेत्रों में वैचारिक परिवर्तन: पाकिस्तान आदि क्षेत्रों के लोगों को यह समझाना होगा कि राष्ट्रीयता का आधार मत-पंथ नहीं, अपितु साझी संस्कृति और इतिहास है (जैसे बलूचिस्तान का संघर्ष)। अखंड भारत के निर्माण से इस पूरे क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि, शांति और प्रगति का मार्ग प्रशस्त होगा।
वैश्विक परिदृश्य में बदलते समीकरण:
नारी शिक्षा का विस्तार, आर्थिक विकास में सहभागिता, पेट्रो-डॉलर के घटते प्रभाव से इस्लामी देशों की प्राथमिकताओं में आ रहा परिवर्तन। अखंड भारत की व्यावहारिक संकल्पना राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक और सभ्यतागत है। इसका अर्थ कोई थोपा हुआ कठोर केंद्रीय शासन नहीं है। जिस प्रकार भारत, नेपाल, भूटान, श्रीलंका आदि के संबंध हैं और सार्क (SAARC) की मूल भावना है — उसी प्रकार एक साझा सांस्कृतिक-आर्थिक परिसंघ बन सकता है। यदि जर्मनी, वियतनाम और कोरिया के एकीकरण की बात हो सकती है, तो अखंड भारत क्यों नहीं? जिस प्रकार 'वेलिंग वॉल' के प्रति यहूदियों की अटूट श्रद्धा ने इज़राइल का पुनर्जन्म संभव किया, उसी प्रकार महर्षि अरविंद के आश्रम में स्थापित अखंड भारत का मानचित्र आज भी हमारे संकल्प का प्रतीक है।
"एक संकल्पबद्ध और निष्ठावान समाज बड़े से बड़ा परिवर्तन ला सकता है।" (याची देही याची डोला — इसी देह और इन्हीं आँखों से इस स्वप्न को साकार देखना है)।
महापुरुषों के अमर विचार:
स्वातंत्र्यवीर सावरकर: "आइए, हम अपनी प्राप्त स्वतंत्रता को सुदृढ़ आधार पर स्थापित करें और अखंड भारत के निर्माण के लिए स्वयंको समर्पित करें।"
पंडित दीनदयाल उपाध्याय: "अखंड भारत केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक सुविचारित संकल्प है। कुछ लोग विभाजन को एक स्थायीरेखा मानते हैं; उनका यह दृष्टिकोण नितांत अनुचित है और मातृभूमि के प्रति तीव्र निष्ठा के अभाव को दर्शाता है।"
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद: "पाकिस्तान की मांग इस्लाम की मूल भावना के विरुद्ध है। यह कैसे कहा जा सकता है कि मुस्लिम बहुलप्रांत ही पवित्र (पाक) हैं और शेष सारे प्रांत अपवित्र (नापाक) हैं?"
लॉर्ड वेवेल: "ईश्वर ने इस देश को भौगोलिक रूप से एक बनाया है। आप इसे कृत्रिम रूप से दो भागों में नहीं बाँट सकते।"
क्लेमेंट एटली: "आप इसे विभाजित नहीं कर सकते क्योंकि यह प्रकृति/देवताओं द्वारा निर्मित एक अखंड त्रिकोण है।"
गुलाम मुर्तज़ा सैयद (संस्थापक, जिये सिंध): "विगत दशकों का इतिहास साक्षी है कि विभाजन से किसी का भला नहीं हुआ। यदि भारतआज अपने मूल स्वरूप में अखंड होता, तो वह विश्व की महाशक्ति होने के साथ-साथ वैश्विक शांति का सबसे बड़ा केंद्र होता।"
लोकनायक जयप्रकाश नारायण: "हम सभी — भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले लोग — मूलतः एक ही राष्ट्र के अंग हैं।हमारी शासन व्यवस्थाएँ भले ही अलग हों, परंतु हमारी राष्ट्रीय आत्मा और सांस्कृतिक पहचान एक ही है।"
न्यायमूर्ति मोहम्मद करीम छागला: "मुझे यह कटु सत्य अनुभव हुआ है कि तत्कालीन नेतृत्व राष्ट्रवादी मुसलमानों के प्रति उदासीन रहाऔर उन्होंने जिन्ना की सांप्रदायिकता को अधिक महत्व दिया। यदि प्रारंभ से ही अलगाववादियों के स्थान पर राष्ट्रवादियों को संबल दियागया होता, तो देश का यह दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम न होता।"
डॉ. राममनोहर लोहिया: "भ्रष्टाचार से उत्पन्न पाप तो धोए जा सकते हैं, परंतु जिन्होंने भारत माता की आत्मा का विभाजन स्वीकार किया, उन्होंने महापाप किया है। आइए, हम अपने पूर्ववर्ती नेताओं की इन ऐतिहासिक भूलों का परिमार्जन करने का संकल्प लें।"
क्या हम अपने इन महान राष्ट्रनायकों के स्वप्न को पूर्ण नहीं करेंगे?
"हम करें राष्ट्र आराधन..."

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